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Wednesday, November 9, 2011

पतझड़


पेड़ों की शाखाए चुप हैं लुटा हुआ श्रृंगार लिए ,
पापी पछुवा के झोंको ने सारे वस्त्र उतार लिए

कब से रस्ता देख रहा है पतझड़ से सन्देश कहो ,
पीला पत्ता हरी मुलायम कोंपल का उपहार लिए


कितनी जल की धाराओं ने पाँव छुवा और लौट गयीं ,
मैं सागर तट पर बैठा हूँ तृष्णा का अंगार लिए


जल पथ पर तूफ़ान खड़े हैं पत्थर की दीवार बने ,
मांझी नौका मे बैठा है एक टूटी पतवार लिए


बाहर का है दृश्य कैसा नन्ही चिड़िया भय खाकर ,
छुपी घोंसले मे बैठी है छोटा सा परिवार लिए


नेत्रहीन निंद्रा है अपनी क्या देखू क्या ध्यान करूँ ,
घर से रैन चली जाती है सपनो का संसार लिए


हे दिनकर हे अम्बर पंथी उज्यारे के दूत ठहर ,
संध्या स्वागत को आयी है अन्धकार का हार लिए


कल जिनको घिर्णा थी तेरी रचनाओ से आज वही ,
काज़िम तुझको खोज रहे हैं हाथों मे अखबार लिए -- काज़िम जरवली

Thursday, October 27, 2011

गर्म-ए-सफ़र

अभी और गर्म-ए-सफ़र रहो, वहीँ फ़िक्रे तशना लबां रुके,
जहा ज़िन्दगी का क़याम हो, जहा रख्ते अब्रे रवां रुके

कहाँ कितनी शाखें उजड़ गयीं, कहाँ कितने गुल हुए बे सदा,
मै शजर शजर का हिसाब लूँ , ज़रा ज़ोरे क़ेहरे खिज़ां रुके

गले तेग़े-ए-तुन्द से जोड़ दो, रगे अपनी अपनी निचोड़ दो,
जो चली है दामने दश्त से, न वो ज़ूवे खूने रवां रुके

कभी लम्हा भर तेरे सामने, ऐ सूकुते काज़िमे बे नवा,
ना सफ़ीरे अहले ज़बां रुके, न ख़तीबे शोला बयां रुके ।।  --काज़िम जरवली

पाँच सितारा होटल

याद आती है !!!
बांस की खाट पर बैठी हुई,
टेढ़े सींगो वाली पागुर करती काली बकरी ।।
याद आती है !!!

कच्ची दीवार की ओट से
चाँद के चेहरे पर बादल सी मैली ओढ़नी,
पुरानी चाँदी के मैले कंगन की ।।
याद आती है !!!

चमचमाते हुये पीतल के बर्तनो की
रामदास और दीन मोहम्मद के आँगन की,
दही, राब और लेमू की पत्ती से बने शरबत की ।।
याद आती है !!!


तुम किया सोच रहे हो ?
तुम तो पांच सितारा होटल मै हो !
मै किया जवाब दूँ ???

इन मै से कोई सितारा मेरे काम का नहीं
जो मेरे थे,
मेरी पलकों मे बसे हुए हैं ।।
कुछ मेरे गाँव की मिटटी मे रचे बसे हुएं हैं ।।।     --काज़िम जरवली