Thursday, October 27, 2011

ग़र्दिश-ए-दुनिया

मुफलिसी मे भी यहाँ खुद को संभाले रखना,
जेब खाली हो मगर हाथो को डाले रखना  

रोज़ ये खाल हथेली से उतर जाती है,
इतना आसान नहीं मुह मे निवाले रखना

गाँव पूछेगा के शहर से किया लाये हो,
मेरे माबूद सलामत मेरे छाले रखना

ज़िन्दगी तूने अजब काम लिया है मुझ्से,
ज़र्द पत्तो को हवाओ मे संभाले रखना

जब भी सच बात ज़बां पर कभी लाना काज़िम
ज़ेहन मे अपने किताबो के हवाले रखना ।।    --काज़िम जरवली

वन्दे मातरम

बात सच्ची हो तो चाहे जिस ज़बा मे बोलिये,
फर्क मतलब पर नहीं पड़ता है ख़ालिक़ कि क़सम
"माँ के पैरो मे है जन्नत" क़ौल है मासूम का,
मै मुसल्ले पर भी कह सकता हुं वन्दे मातरम ।।    --काज़िम जरवली

संगे-जब्र

अपना दिल अब अपने दिल के अन्दर लगता है,
हम को मन्ज़र से अच्छा पस मन्ज़र लगता है

बिन ठहरे चलते रहते हैं हाथ, मगर फिर भी,
रात की रोटी तक आने मे दिन भर लगता है

ईंटो और गारो से जिनका रिश्ता कोई नहीं,
उनके नाम का दीवारों पर पत्थर लगता है

ज़ैसे कुछ होने वाला है थोड़ी देर के बाद,
शहर मे अब रातो को ऐसा अक्सर लगता है

उन बूढ़े बच्चो को, लोरी देकर कौन सुलाए,
रात को जिनका घर के बाहर, बिस्तर लगता है

बाते गर्म करो तुम लेकिन, ठन्डे लह्जे मे,
उनी कपड़ो मै रेशम का अस्तर लगता है

उसको अपने साये मे रक्खे, कैसे कोइ पेड़,
जिसको अपनी परछाई से भी डर लगता है

इन चांदी सोने वालो से काज़िम दूर रहो,
इनकी कब्रों पर भी महंगा पत्थर लगता है ।।   --काज़िम जरवली

नुकूश

बड़े हुनर से समेटे हैं दर-बदर के नुकूश ,
बजाये पाव के चेहरे पा हैं सफ़र के नुक़ूश

ये अह्द-ए-नौ के तक़ाज़े, ये कुछ थकी रस्मे,
नये मकान मे जैसे पुराने घर के नुक़ूश

हमारे फ़न कि कही भी नहीं है गुंजाईश,
वरक़ वरक़ है किसी साहिबे हुनर के नुक़ूश ।।  --काज़िम जरवली

सराब-ऐ-हयात

सराबो से नवाज़ा जा रहा हूँ,
आमीर-ए-दश्त बनता जा रहा हूँ

मैं खुशबु हु यह दुनिया जानती है,
मगर फिर भी छुपाया जा रहा हुं

ज़माना मुझ्को सम्झे या न सम्झे,
मै एक दिन हूँ, जो गुज़रा जा रहा हूँ

मेरे बाहर फ़सीले आहनी है,
मगर अन्दर से टुटा जा रहा हूँ

मेरे दरिया, हमेशा याद रखना,
तेरे साहिल से पियासा जा रहा हूँ

तुम अब थकती हुई नज़रे झुका लो,
बुलंदी से मै उतरा जा रहा हूँ ।।   --काज़िम जरवली

फ़िक्रे-रवां

दुनिया का सफ़र करता हुं मै खुद से निकल कर,
तन्हाई मै खुलते है नए दर मेरे अन्दर

एक नूर सा होता है मुनव्वर मेरे अन्दर,
खुलता है सहीफ़ा कोई अक्सर मेरे अन्दर

दरियाओं के पानी से मै मरऊब नहीं हुं,
पहले से है मौजूद समन्दर मेरे अन्दर

काज़िम मै हमेशा से उसी का हुं मुक़्क़लिद,
तबलीग़ कुना है जो पयम्बर मेरे अन्दर ।।   --काज़िम जरवली

गर्म-ए-सफ़र

अभी और गर्म-ए-सफ़र रहो, वहीँ फ़िक्रे तशना लबां रुके,
जहा ज़िन्दगी का क़याम हो, जहा रख्ते अब्रे रवां रुके

कहाँ कितनी शाखें उजड़ गयीं, कहाँ कितने गुल हुए बे सदा,
मै शजर शजर का हिसाब लूँ , ज़रा ज़ोरे क़ेहरे खिज़ां रुके

गले तेग़े-ए-तुन्द से जोड़ दो, रगे अपनी अपनी निचोड़ दो,
जो चली है दामने दश्त से, न वो ज़ूवे खूने रवां रुके

कभी लम्हा भर तेरे सामने, ऐ सूकुते काज़िमे बे नवा,
ना सफ़ीरे अहले ज़बां रुके, न ख़तीबे शोला बयां रुके ।।  --काज़िम जरवली